सावन में धरती सुहागन हुई

सावन बहुत ही सुहाना महीना है धरती की शोभा बढ़ने की मेन

वजह है वर्षा और वर्षा लिए सावन से बढ़िया कोई महीना नहीं ऐसा प्रतीत होता है कि सावन में धरती सुहाग का हरा जोड़ा पहन कर रंगीन फूलों से सजी हुयी अपने ससुराल प्रकृति के घर जा रही है

मानो आज धरती के घर हरियाली बारात लेकर आई है आसमान के उड़ते बादल जैसे बारात का स्वागत करने को आतुर है पेड़ों पर आए हरे, हरे पत्ते मेहमान नवाजी कर ने को तैयार हो जब विजली कड़कती है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बाराती आतिशबाजी कर रहे हैं और आसमान में इंद्रधनुष के रंग चौक पुरा रहे हैं बारिश की बूंदों से इंद्र ने धरती माँ के चरण पखारे है सावन में आने वाले त्यौहार जैसे विवाह की रश्म हो जिसे पूरा करने के लिए पृथ्वी वासी

जोरदार तैयारी में लगे है चारों तरफ खुशी का माहौल है कही सावन के मंगल गीत गाए जा रहे है तो कहीं नृत्य की छटा विखेरी जा रही है

चारो दिशाओं में खुशी के रंग विखरे पड़े हैं फूलों ने अलग अलग तरह से सिंगार कर के तैयार है धरती की शोभा में जैसे कोई चित्र कार अपने रंगों से खूबसूरत चित्र कारी की हो

कवि की कल्पना से भी सुंदर धरती का स्वरूप है सावन की रिमझिम फुहार सुहानी लगती है ।धरती का कोना कोना प्रफुल्लित हो गया पेड़ों पर फल फूल से मानो सिंगार हुआ है सावन में धरती अपने पूर्ण यौवन पर सोलह सिंगार से सजी हुयी है ए पर्वत मालाएं जैसे वरमाला पहना रही है सावन में धरती पर जन मानस के द्वारा की जाने वाली शिव शंकर की आराधना जैसे विवाह के मंत्रोच्चारण कर रहे हैं

हमारी गंगा मइया की आरती की थाली ऐसे सजी है जैसे कोई धरती माँ की नजर उतार रही हो

हवा के झोंके मानो दुल्हन की पालकी को कंधे पर उठाए चले जा रहे है

सावन में धरती पर झम झम बारिश अमृत के समान लगती हैं खेतों में खेती की हरियाली से हमारे घरों में पूरे साल धन धान्य की कमी नहीं होती है जब धरती अपना रूप संवारती है तो अन्नपूर्णा माँ का आशीर्वाद जम के बरसता हैं माँ धरती वासियों को अनन्त शुभकामनाओं और आशीर्वाद से फली भूत करती हैं धरती भी उपहारों का भंडार मानव जाति और विश्व के कल्याण के लिए देती कही हीरे का भंडार है तो कहीं सोने की खान कही पर कीमत यूरेनियम है तो कहीं पर तेल के भंडार जब पॄथ्वी हमें इन उपहारों से नवाजती तो मानव का भी धर्म है कि वह प्रकृति का प्रहरी बने उसकी रक्षा करे धरती माँ के सुहाग हरियाली को उजाड़े नहीं

लेकिन हम अपने धरती के वैभव को नुकसान पहुंचा देता उजाड़ देते है फलस्वरूप हमसे हमारी धरती माँ रूठ जाती हैं हमें उनके क्रोध का सामना करना पड़ता है

कही तूफान तो कहीं पर भूकंप से तबाही कहीं पर बाढ़ का प्रकोप झेल ना पड़ता है जन जीवन को नुकसान उठाना पड़ता है इसलिए हर मनुष्य का कर्तव्य है कि धरती माँ को सदा सुहागन होने का आशीर्वाद दे उसकी रक्षा करे ।।

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